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बिहार पीपुल्स पार्टी के आपात बैठक से सत्ता के गलियारों में हड़कंप

 देश के चर्चित व कद्दावर राजनेता वर्षो से जेल में बंद रहने के बाद भी पूर्व सांसद आनंद मोहन का निसंदेह आज भी कम से कम बिहार की सक्रिय राजनीति में एक मजबूत हस्तक्षेप है. अपने समर्थकों के दम पर आनद मोहन आज भी कितने नेताओं को विधान सभा तक पहुंचाने और उन्हें वहाँ पहुँचने से रोकने का दम रखते हैं, इसमें कहीं कोई शक–शुब्बा नहीं है. वर्तमान पक्ष विपक्ष के कई नेता आज भी इनके मार्गदर्शन पर चलते है और कई इनके सम्पर्क में है.  

गौरतलब है कि बीते दिन 12 सितम्बर २०१५ को पूर्व सांसद आनंद मोहन के समर्थकों ने बिहार पीपुल्स पार्टी “बिपीपा” का पुनर्गठन करने के लिए एक आपात बैठक बुलाई जिसमे आनंद मोहन के जो भी समर्थक थे जो आने में सक्षम थे इस बैठक में आकर फिर से पार्टी में जान लागने का काम किया है. खास कर 12 सितम्बर को स्थानीय युवाओं ने बिहार पीपुल्स पार्टी को फिर से जिन्दा करने का काम किया है जिसका असर बिहार के राजनीती में दिखने लगा है. आनन्द मोहन उस सख्सियत का नाम है जिसके पार्टी में कोई जातिवाद की कोई जंजीर नहीं है. सभी मजहब के लोग इनके आज भी समर्थक है. बिपीपा को फिर से राजनितिक में हस्तक्षेप के लिया युवाओं ने आगे कदम बढा चूका है. 90 के दशक में बिपीपा एक धारदार विपक्ष की भूमिका में अवतरित हुई थी। जिसका मुख्य उद्देश्य जमीनी लड़ाई को लोग आज भी गंभीरता से याद करते हैं. पार्टी का यह नारा – ‘हमारा लड़ना जिन्दाबाद, हमारा मरना जिन्दाबाद’ खुद में बहुत कुछ बयां करता है ।

बिपीपा 95 में युवा इकाई के पूर्व अध्यक्ष श्री कुलानन्द यादव ‘अकेला’ ने कहा की आज जब शासक वर्ग सत्ता के दर्प में मदहोश है और विपक्ष हताशा में बेहोश तो बिपीपा जैसी जुझारू पार्टी की जरूरत आमजन शिद्दत से महसूस करते हैं। ऐसे में सहरसा के युवाओं का प्रयास अभिनंदनीय है । उन्होंने आगे कहा कि बिहार पीपुल्स पार्टी साम्प्रदायिक और जातिवादी सोच में यकीन नहीं रखती, बल्कि वह गांधी, लोहिया, जयप्रकाश की समाजवादी विचारधारा में विश्वास रखती थी और भविष्य में भी रखेगी.
श्री अकेला ने आगे कहा कि पुनर्गठन की दिशा में विस्तृत बातचीत हेतु वे शीघ्र आनंद मोहन जी से मिलकर अगले माह अगली तिथि का निर्धारण करेंगे तथा झारखंड और बिहार सहित देश भर में फैले आनंद समर्थकों की पटना में बैठक आहूत की जाएगी। इस बारे में पूर्व सांसद श्रीमती लवली आनंद जी और फ्रेंड्स ऑफ आनंद के केंद्रीय कार्यकारी अध्यक्ष श्री चेतन आनंद से मेरी प्रथम दौर की बातचीत सम्पन्न हो चुकी है तथा उनकी सहमति पर ही मैं आज की बैठक में उपस्थित हुआ हूँ ।

आनंद मोहन सितम्बर 2015 पेशी के दौरान कहा था — 

सहरसा टाईम्स के साथ हुयी खास बातचीत के दौरान हमारे सवालों का जबाब उन्होनें बेहद तल्ख़ अंदाज में दिए थे. सब से पहले उन्होनें अपनी राजनीतिक हैसियत को लेकर कहा की “वे कोई फुटबॉल नहीं जो किक मारकर कोई कार्नर कर दे”. वे बीते सालों से जेल में और सोलह साल से सड़क पर हैं. अगर कोई बड़ा लीडर महज एक साल तक जेल रहे और दो वर्षों तक सड़कों पर तो उसकी स्थिति कुत्ते से भी बदतर हो जायेगी. आज उनकी अहमियत बरकार है तभी कोई राजनेता उन्हें पूछते हैं.

पार्टी के पूर्व महासचिव श्री एस० के० ‘विमल’ ने अपनी यादों को ताजा करते हुए कहा कि बिहार के हर छोटी- बड़ी घटनाओं की खबर मीडिया को तब मालूम होता थी, जब पार्टी प्रमुख आनंद मोहन जी वहाँ पहुँचकर संघर्ष छेड़ देते थे। हम लड़ाई को अंजाम तक पहुँचाते थे। आज पार्टियां संघर्ष करती नहीं ,संघर्ष की औपचारिकताए निभाती हैं। ऐसे में बिपीपा का पुनर्गठन वक्त का तकाजा है। उन्होंने आगे कहा कि – हमारी राजनीति अर्थ और पद के लिए नहीं सेवा और संघर्ष के लिए है । आज की बैठक बिपीपा की पुनर्गठन की दिशा में “माइल स्टोन” साबित होगा ।
पार्टी के पूर्व प्रान्तीय सचिव मो. फैयाज आलम ने अपने संबोधन में बताया कि बिपीपा अपनी विचारधारा और पार्टी चरित्र से न कभी समझौता किया है और न करेगी। MLA, MP वही बनेंगें जो पार्टी बनाएगा ।
इं. रमेश सिंह ने कहा कभी बिपीपा और आनंद मोहन जी की लोकप्रियता का आलम यह था कि वर्ष 1991 में मधेपुरा और वर्ष 1994 में वैशाली संसदीय उपचुनाव में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियां कहीं खड़ी नजर नहीं आतीं थीं और उनकी यही लोकप्रियता शातिर राजनीति की शिकार बनीं। हमें फिर से एक बार बिपीपा को लोकप्रियता के शिखर तक पहुंचाना है। बैठक की अध्यक्षता जिलाध्यक्ष श्री चंदन सिंह और संचालन श्री अजय कु. बबलू ने की।

 

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