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राजनीति का आपराधीकरण बनाम नौकरशाही का राजनीतिकरण

 पूर्व सांसद आनन्द मोहन सिंह के टाईम लाइन से ली गई पोस्ट है :: — #भूमिका# “राजनीति का आपराधीकरण बनाम नौकरशाही का राजनीतिकरण” पर लिखा मेरा यह आलेख आज से 18 वर्ष पुराना है । जो 16 जून 2000 को हिन्दुस्तान में छप चुका है ।तब हिंदुस्तान के स्थानीय संपादक गिरीश मिश्रा जी मेरे अच्छे मित्रों में से थे ।15 जून को दिल्ली जाने के पहले औपचारिकताबस घूमते-फिरते मैं उनके दफ्तर पहुँचा ।  बात बे बात अपराध के राजनीतिकरण पर चुनाव आयोग के ताजा फैसले को ले चर्चा छिड़ गई ।बहस में मेरे पक्ष से वे प्रभावित दिखे और आग्रह किया कि आप अगर इसे लिपिबद्ध करें तो मैं इसे कल ही छाप दूँ । वे कागज-कलम बढ़ा कर अपने सम्पादकीय कार्यों में व्यस्त हो गये और मैं लिखने में तल्लीन । ठीक 45 मिनट बाद मैंने यह आलेख उनकी ओर बढ़ाया, चाय लिया और वहीं से दिल्ली के लिये एयरपोर्ट को चल पड़ा । वादे के अनुरूप दूसरे दिन यह हूबहू हिंदुस्तान में छपा, जो मेरी समझ से आज भी सामयिक है । शेयर कर रहा हूँ ।शायद पसंद आये…..

#राजनीति का #अपराधीकरण” 
बनाम 
#नौकरशाही का #राजनीतिकरण” 

वर्ष 1996 में मैं पहली बार जेल से लोकसभा चुनाव जीतकर आया था । चुनाव आयोग ने राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ एक साहसिक और कठोर फैसला लिया था। फैसला था, “निचली अदालत ने जिस किसी को आपराधिक मामले में दोषी करार दिया है, उसे विधानसभा , विधानपरिषद , लोकसभा एवं राज्यसभा के चुनावों से वंचित रखा जाय” । फैसले को लेकर राजनीतिक सरगर्मियाँ चरम पर थीं ।इसके पक्ष – विपक्ष में तर्कों के बाजार गर्म थे । कुछ लोगों ने इसे आयोग का अतिवादी फैसला माना और आयोग का संविधान और न्यायपालिका के विरुद्ध आचरण कहा, कारण निचली अदालत के फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय एवं उच्चतम न्यायालय जाने की परम्पराएं और संवैधानिक हक रहे हैं और जब तक सर्वोच्च न्यायालय अंतिम तौर पर किसी व्यक्ति को दोषी करार नहीं देता, संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप वह व्यक्ति अपराधी नहीं है ।

इस तरह बहुत से लोगों ने आयोग के इस निर्णय को एक सनकी फैसला माना ।ऐसी मान्यताएं आपराधिक पृष्ठभूमि से राजनीति में आनेवाले लोगों के मनोनुकूल थीं । उन्हें यह बहुत अच्छा लगा । ऐसे लोगों ने दूरदर्शन और अखबारों को दिये साक्षात्कार में उस समय जोरों का बावेला मचाया और यहाँ तक कहा कि चुनाव आयोग के इस फैसले के खिलाफ आवश्यकतानुसार न्यायालयों का दरवाजा खटखटाएंगे ।वो कौन लोग चुनाव आयोग के इस फैसले से सहमे थे ? जो अपराध के पंक पर पले-बढ़े , सत्ता की राजनीति का संरक्षण पाया और राजनीति को अपराध का संरक्षण दिया , मौका देख स्वयं राजनीति में घुस आये और अब राजनीति को अपने कुकर्मों पर पर्दा डालने का औजार तथा अपने बचाव का हथियार बना रहे हैं । उन्हें भय है कि राजनीति के संरक्षण में हमने जिन्हें लूटा – खसोटा , सताया और जिन्हें अपना शिकार बनाया, राजनीतिक कवच हटते ही वो हमें खत्म कर डालेंगे । चुनाव आयोग के फैसले से वो लोग नहीं डरते जो यथास्थितिवादी व्यवस्था के खिलाफ सर पर कफन बांध कर बदलाव के संकल्प के साथ संघर्ष पथ पर चले और व्यवस्था पर कुंडली मारकर बैठे यथास्थितिवादियों ने जिन बागियों को अपने प्रभावों का दुरूपयोग कर अपराधी घोषित कर दिया ।
अखबारों एवं दूरदर्शन की कुछ टोलियां भटकती हुई मेरे पास भी आयीं , क्योंकि उनकी अवधारणा मेरे बारे में भी अच्छी नहीं थी ।उन्हें उम्मीद थी कि अपराधी पृष्ठभूमि के जो लोग इनके प्रबल विरोध में खड़े हैं , मैं भी उनमें से एक होऊंगा । उन्हें यह नहीं मालूम कि हमारे पुरखों की तीन पीढ़ियों ने स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका अदा की । वो सभी तिलक से लेकर गाँधी तक के विचारों के प्रबल समर्थक थे । गाँधी में उनकी श्रद्धा औऱ निष्ठा का पारितोषिक ही था कि तब गाँधी स्वयं चलकर मेरे घर आये और ये मेरे परिजनों की बलिदानी परम्परा का ही हिस्सा था कि आजादी के लिए उन्होंने न केवल असीम यातनाएं सही , वरन जब बापू ने स्वतंत्रता के ‘ संघर्ष कोष ‘ के लिए दान की अपील की तो दादी माँ की अगुआई में परिवार की बेटियों और बहुओं ने सेरों जेवरात गाँधी के चरणों मे भेंट कर दी । मैं स्वयं जे० पी० आंदोलन की उपज हूँ ।
खैर ,यहाँ हम कहीं अन्यत्र उलझाना नहीं चाहते और इस सवाल को यहीं छोड़ आगे बढ़ना चाहेंगे ।
चुनाव आयोग के इस फैसले के पक्ष में जब मैं खड़ा हुआ तो प्रेस के लोग अचंभित थे ।उनमें कइयों ने मुझसे प्रश्न दागे – आप पर कई मुकदमें हैं , मान ले उनमें से किसी एक में भी निचली अदालत आपके खिलाफ फैसला सुनाती है तो आपका राजनीति कैरियर पूरी तरह चौपट हो जाएगा । ऐसे में इस फैसले के पक्ष में खड़ा होना आपके लिए कहाँ तक उचित है ?मेरा जवाब था – कि मैं कोई आचार्य नरेन्द्र देव , नेहरू , लोहिया , जयप्रकाश, अम्बेदकर अटल या चंद्रशेखर तो नहीं कि अगर मैं सदन में नहीं रहूँ तो मेरी कमी संसद को खलेगी या मेरे वगैर देश रुक जायेगा ।मेरे जैसे व्यक्ति के चुनाव से वंचित हो जाने से अगर राजनीति अपराधमुक्त होती है तो लोकतंत्र की मर्यादा और संसद की गरिमा की रक्षा के लिए मैं अपनी गर्दन सबसे पहले भेंट करूंगा , क्योंकि मैं जानता हूँ अगर हममें क्षमता , प्रतिभा और विचार होंगे तो इस अवसर से वंचित रहकर भी मैं अपनी जगह कइयों को लोकसभा और विधानसभा जाने लायक बना दूंगा और फिर निचली अदालत के फैसले हमें अंतिम तौर पर चुनाव से खारिज तो करती नहीं ? उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय अगर हमें आरोप से दोषमुक्त करता है तो चुनाव लड़ने के हम फिर से हकदार बन जाते हैं ।अंतर सिर्फ इतना का है कि पहले सर्बोच्च न्यायालय जबतक अंतिम तौर पर किसी को दोषी नहीं ठहराता, अपराध की आम परिभाषा में वह दोषी नहीं है और तबतक चुनाव में कोई इस आधार पर उसे वंचित नहीं रख सकता था, लेकिन निचली अदालत के फैसले के आलोक में चुनावों से वंचित व्यक्ति के स्वयं की जिम्मेवारी होगी कि वो ऊपरी अदालत में विशेष दिलचस्पी लेकर खुद को वरी करवाये ।
भारतीय कानून के अंतर्गत न्यायिक प्रक्रिया इतनी लंबी और जटिल है कि कोई भी शातिर से शातिर अपराधी अगर उसके पास साधन और पहुँच हो तो निचली अदालतों में दोषी करार दिए जाने के बाद भी इन कमियों का लाभ लेकर ताजिंदगी चुनाव लड़ता और जीतता रहेगा और कई दशकों तक कानून को ठेंगा दिखा अंतिम फैसला को रोके रखने में सक्षम होगा ।अतः सब जानते हुए मैं चुनाव आयोग के इस साहसिक फैसले के पक्ष में खड़ा हूँ ।
पिछले दिनों चुनाव आयुक्त एम० एस० ‘ गिल ‘ के नेतृत्व में आयोग ने एक बार फिर अपराध के राजनीतिकरण एवं राजनीति के अपराधीकरण की रोकथाम के लिए दुस्साहसपूर्ण फैसला किया ।
तब श्री गिल ने कहा – “हर वो व्यक्ति जो किसी ऐसे मुकदमे में चार्जशीटेड हो जिसकी सजा कम से कम पाँच साल हो सकती है , उन्हें भी चुनाव से वंचित कर दिया जाय । पिछले 29 अप्रैल 2000 को इस सवाल पर दिल्ली में मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ आयोग की बैठक थी ।मैं नहीं जानता कि इस विषय पर बैठक में किस पार्टी के किस नेता की राय क्या थी ? लेकिन मेरी राय में मुख्य चुनाव आयुक्त एम० एस० ‘ गिल ‘ का यह प्रस्ताव अगर मान लिया जाय तो इससे बड़ा अनर्थ और भारतीय लोकतंत्र को इससे बड़ा अनिष्ट और कुछ हो ही नहीं सकता ।
राजनीति में बढ़ते अपराध को लेकर चिंतित बुद्धिजीवियों को यह प्रस्ताव भले ही तत्काल सुकून देने वाला लगता हो, लेकिन यह इसका मात्र लुभावना और सैद्धांतिक पहलु है।जमीनी हकीकत और व्यवहारिक पहलु इससे कोशों दूर है ।हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सामाजिक परिप्रेक्ष्य में हम कहाँ खड़े हैं। हम नैतिक पतन की पराकाष्ठा पर हैं ।राजनीति के अपराधीकरण से पूर्व लोकतंत्र कई दशकों की यात्रा कर चुका था।,लेकिन नौकरशाही का राजनीतिकरण आजादी के तुरंत बाद शुरू हो गया था और यह समझने में भी चूक नहीं होनी चाहिए कि जिस नौकरशाही का राजनीतिकरण हो चुका, उसके भरोसे भ्रष्टाचार और अपराध पर नियंत्रण नहीं किया जा सकता, क्योंकि जब व्यक्ति का वर्दी और ईमान सत्ता की चौखट पर गिरवी हो तो भ्रष्टाचार और अपराध के राजनीतिकरण पर लगाम कौन देगा? मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि मूल्यों के क्षरण और नैतिक पतन के इस दौर में प्रधान मंत्री और मुख्यमंत्री की कौन कहे, आईएएस, आईपीएस जैसे बड़े नौकरशाहों की कौन कहे, राजनीति में पैदा होनेवाला हर संघर्षशील नौजवान का राजनीतिक कैरियर एक मंत्री, विधायक के इशारे पर इंस्पेक्टर और सब इंस्पेक्टर ही चार्यशीट कर सदा के लिए तबाह कर सकता है
इस तरह राजनीति से संघर्ष का एक बड़ा ही जीवंत पक्ष सदा – सदा के लिए समाप्त हो जायेगा , और संघर्ष के बगैर चलने वाली राजनीति बांझ साबित होगी ।
तब राजनीति में आदर्शों एवं सिद्धान्तों का मनभावन , सुनहरा पक्ष तो ठूँठ की तरह खड़ा मिलेगा , लेकिन आदर्शों एवं सिद्धान्तों के लिए बलिदान और संघर्ष का पक्ष विलुप्त हो जायेगा ।फिर आमजन की पीड़ा और जलते सवालों को लेकर खड़ा होने का मादा ही मिट जायेगा ।
-आनंद मोहन
(क्रमशः)

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